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क्रॉनिक मलेरिया

क्रॉनिक मलेरिया : अफ्रीका व दक्षिण पूर्वी इलाकों में मलेरिया के परजीवियों का घनत्व ज्यादा होने के साथ सालभर प्रकोप रहता है। यहां क्रॉनिक मलेरिया के मरीज ज्यादा होते हैंए इन्हें तिल्ली के बढऩे व एनीमिया की दिक्कत रहती है।
 
ऐसे फैलता संक्रमण : सबसे पहले लिवर पर असर ,
 
मलेरिया से पीडि़त व्यक्तिको काटने से उसके शरीर में मौजूद प्लाजमोडियम परजीवी मच्छर की लार में आ जाता है और स्वस्थ व्यक्तिको काटने पर यह उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। रक्त में लार के प्रवेश करने के 48-72 घंटे बाद लिवर को नुकसान होता है। प्लाजमोडियम परजीवी लिवर के बाद दोबारा रक्त वाहिकाओं में फैलने लगता है। परजीवी लाल रक्त कणिकाओं पर हमला कर उन्हें नष्ट कर अपनी संख्या बढ़ाते हैं। संख्या के बढ़ऩे से शरीर के अन्य अंग जैसे किडनी, फेफड़े व दिमाग पर असर दिखने लगता है।
 
 जांच व इलाज :
 
मलेरिया का पता लगाने के लिए पहले रेपिड एंटीजन टैस्ट करते हैं। फिर पैरिफेरल ब्लड फिल्म (पीबीएफद्) टैस्ट होता है जिसमें परजीवी के प्रकार की पहचान होती है।
 
आर्टिसुनेट क्लोरोक्यूनीन आर्टिमीथीर व क्यूनीन दवा देते हैं। यदि मरीज दवा न खा सके तो इन्ट्रावीनस ;आईवीएमद्ध या इन्ट्रामस्कुलर इंजेक्शन से दवा देते हैं।
प्रिवेंटिव डोज रू डॉक्टरी सलाह के बाद ही कीमोप्रोफाइलेक्सिस दवा दी जाती है। एंटीमलेरियल वैक्सीन क्रञ्जस्एस्ध् रस् का प्रायोगिक स्तर पर शोध जारी है।
 मरीज को लिक्विड डाइट के अलावा मौसमी फलए दलिया या खिचड़ी दें। तली.भुनी, मसालेदार व ठंडी चीजें न दें।
 
खानपान :  मरीज को लिक्विड डाइट के अलावा मौसमी फलए दलिया या खिचड़ी दें। तली.भुनी, मसालेदार व ठंडी चीजें न दें।